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स्मार्टफोन का अनस्मार्ट पहलू

अपडेट किया गया: 14 नव. 2019

वर्तमान में हम ऐसे युग में रह रहे हैं जहाँ जन-सामान्य का प्रत्येक वर्ग अपनी दिनचर्या का अधिकांश समय सोशल मीडिया के माध्यम से अपने स्मार्टफोन की भक्ति में ही गुजार रहा है । अधिकांश व्यक्ति इसी जुगाड में लगे दिखते हैं कि “उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे ?” वाली शैली में उसका स्मार्टफोन मुझसे ज्यादा लेटेस्ट क्यों ?


एक ओर जहाँ एप्पल जैसी सर्वाधिक कीमती स्मार्टफोन मॉडल प्रस्तुत करने वाली नामी-गिरामी कंपनी के नये प्रीमियम मॉडल लांच होते समय दीवानों की चाहत उनसे विश्व-स्तर पर रात-रात भर जागृत अवस्था में लाईन में लगकर प्रतिक्षा करते दिखाई देती है तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर MI जैसी मध्यम व उच्च मध्यम वर्ग के लोगों की डिमांड पूरी करने वाली कम्पनियों के लेटेस्ट मॉडल महिनों ब्लेक में बिकते दिखाई दे रहे हैं ।


         यदि बात समर्थ लोगों के बारे में की जावे तो इसमें अटपटा भी कुछ नहीं लगता लेकिन जब देखा-देखी निम्न वर्ग के लोगों में यह चाहत बलवान बनती है तो फिर वे इसके लिये बडे-बडे अपराध भी कर गुजरते हैं जिनकी अंतिम परिणिति न सिर्फ सालों-साल बल्कि कई बार समूची शेष जिन्दगी जेल के सींखचों के पीछे गुजार देने को उन्हें  मजबूर भी कर देती है-


ताजा घटनाक्रम

मध्यप्रदेश के खरगौन जिले से सामने आया है जिसमें गरीबी के दौर से गुजर रहे तीन बच्चों का पिता अपने लिये 21,000/- रु. का स्मार्टफोन ले आया । उसकी पत्नी ने इसका घोर विरोध किया और गुस्से में अपने पीहर चली गई ।  परिवार की आवश्यकता के मुताबिक वह वापस तो आ गई लेकिन वह स्मार्टफोन उनके बीच झगडे का कारण बना ही रहा ।


गुजरे कल में ही घर के तंगी के माहौल में उस स्मार्टफोन की खरीदी पर जब पत्नी अपनी भडास निकाल रही थी तो क्रोधावेश में उस शख्स ने टूटी हुई खटिया का मजबूत डंडा उठाकर अपनी पत्नी के सिर में मार दिया । पत्नी उस वार को सह न सकी और तत्काल वहीं उसकी मृत्यु हो गई ।


      सोचिये स्मार्टफोन के इस अनावश्यक जुनून ने तीन छोटे-छोटे गरीब बच्चों के सिर से उनके माता-पिता दोनों को साया एक झटके में जीवन भर के लिये छीनकर उन्हें अनाथ व दर-दर का मोहताज बना दिया । माँ तो उनकी अब इस दुनिया में ही न रही और पिता को जीवन भर अब जेल में रहकर अपने किये की सजा भुगतते हुए अपनी इस गल्ति का प्रायश्चित करते रहने की स्थिति देखते ही देखते निर्मित हो गई ।


       हमारे अपने घरों की दुनिया में भी 2-5 साल तक के छोटे बच्चे अपने माँ-पिताजी का स्मार्टफोन लेकर हर समय अनावश्यक वीडिओ, गेम्स व कार्टून सीरिज देखने में लगे रहकर न सिर्फ अपनी आँखें व आदतें खराब कर रहे हैं बल्कि उनका भी देखा-देखी चलने वाला यह चस्का माँ-पिता के अपने स्मार्टफोन नहीं देने की स्थिति में उन्हें अपने पैरेन्ट्स के प्रति बागी व्यवहार का आदी बनाते हुए अपनी शिक्षा से वंचित रखने की आदतों का विस्तार भी कर रहा है । चूंकि यह समस्या अब हर घर में देखी जा रही है इसलिये इसके उपयोग के प्रति कुछ-न कुछ सीमा रेखा तय होना आने वाले समय में हम सभी के जीवन में अत्यन्त आवश्यक लगने लगा है ।


जाहिर है इसके लिये हमें ही अपने स्मार्टफोन के मोह को एक निश्चित अनुशासन के दायरे में रखना आवश्यक हो गया है, अन्य़था जहाँ घर के छोटे अबोध बच्चों में अपनी शिक्षा के प्रति बढती अरुचि और उद्दंडता की प्रवृत्ति के बढने के जिम्मेदार हमारे ही होने के साथ निम्न व गरीब वर्ग के युवा व अधेडवय के लोग नित नये अपराध की राह इसी स्मार्टफोन के मोह के चलते दिखाई देते रहेंगे ।


निवेदन – यह ब्लॉग जैसा कि नाम से जाहिर है– सामान्य नागरिकों के सुगम जीवन हेतु “मतलब की बात” चाहे सामाजिक हो, व्यवसायिक हो या हमारे शरीर-स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो, के समुचित समाधान की तलाश के उद्देश्य से आप तक लाया गया है, आप इसे लेखक का नूतन प्रयास समझते हुए अपना समर्थन देते रहेंगे, आपके सहयोग की इसी कामना के साथ अपनी उपस्थिति यहाँ दर्शाने का प्रयास मेरे द्वारा या जा रहा है ।


       यकीनन आपके साथ व सहयोग से यह ब्लॉग जन-सामान्य के जीवन में आने वाले समय में अपना एक निश्चित स्थान अवश्य बनाता दिख सकेगा ।


इसी आशीर्वाद के साथ...

आपका साथी

सुशील बाकलीवाल

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